कार्तिक मास महात्म्य - Kartikmas Mahatmya PDF

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By Upayogi Books Posted on Nov 16, 2025
In Category - Katha
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।। श्रीगणेशायनमः ।।

।। श्रीराधादामोदराभ्यांनमः ।।

कार्तिकमासमाहात्म्यारम्भः

प्रथमोऽध्यायः

कात्तिक मास व्रत प्रशंसा, कात्तिक धर्म वर्णन, कात्तिक व्रत प्रशंसा नारायणं नमस्कृत्य नरञ्चैव नरोत्तमम्। देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्॥१॥ नारायण, नरोत्तम नर को तथा देवी सरस्वती को प्रणाम करके 'जय' (पुराण) को कहता हूं।।१।।

ऋषय ऊचुः

सूत ! नः कथितम्पुण्यं माहात्म्यमाश्विनस्य च। भूयोऽन्यच्छ्रोतुमिच्छामः कार्त्तिकस्य च वैभवम्॥२॥

कलौ कलुषचित्तानां नराणांपापकर्मणाम्। संसाराब्धौनिमग्नानामनायासेनकागतिः ॥३॥

को धर्मः सर्वधर्माणामधिकोमोक्षसाधकः। इहाऽपि मुक्तिदो नृणामेतत्त्वंकथय प्रभो !॥४॥

 

ऋषिगण कहते हैं- हे सूत ! पुण्यमय आश्विन मास का माहात्म्य आप सबसे कह दिया। पुनः हम कार्तिक मास की विभूति सुनना चाहते हैं। हे प्रभो! संसार सागर में निमग्न कलिकाल के कलुषित चित्तवाले पापी व्यक्तियों की क्या गति होगी? धर्मों में मोक्ष धर्म क्या है? किस उपाय से इहकाल में अनायास मानवों की मुक्ति होती है? यह सब कहिये ? ।।२-४।।

सूत उवाच

भवद्भिर्यदहं पृष्टस्तदेतत्पृष्टवान्मुनिः। नारदो ब्रह्मणः पुत्रो ब्रह्माणं तु जगद्‌गुरुम् ॥५॥

तथैवसत्यभामाच श्रीकृष्णंजगदीश्वरम्। अपृच्छत्कार्तिकस्यैव वैभवं श्रवणोत्सुका ॥६॥

बालखिल्यैश्च ऋषिभिर्यदुक्तमृषिसंसदि । श्रीसूर्यारुणसंवादरूपेणाऽतिमनोहरम् ॥७॥

कैलासे शङ्करेणैवकार्तिकस्यच वैभवम्। वर्णितं षण्मुस्याऽग्रे नानाख्यानसमन्वितम्॥८ ॥

पृथम्प्रतिनारदेनकथितंचमाहात्म्यकम्। कार्तिकस्य च विप्रेन्द्रा श्रुत्वाब्रह्ममुखात्पुरा ॥९॥

एकदा नारदोयोगी सत्यलोकमुपागतः। पप्रच्छ विनयेनैव सर्वलोकपितामहम् ॥१०॥

सूत जी कहते हैं- आप सबने मुझसे जो पूछा है पूर्वकाल में ब्रह्मपुत्र देवर्षि नारद ने अपने पिता जगद्‌गुरु ब्रह्मा से उसी विषय में पूछा था। कृष्णपत्नी सत्यभामा ने भी जगदीश्वर श्रीकृष्ण से कार्त्तिक मास का माहात्म्य सुनने हेतु उत्सुक होकर इस सम्बन्ध में जिज्ञासा किया था। ऋषि सभा में बालखिल्य ऋषिगण ने इस विषय में सूर्यदेव तथा अरुणसंवादरूप मनोहर उपाख्यान को कहा था। कैलास शिखरासीन शंकर ने भी षड़ानन स्कन्द से नाना आख्यान समन्वित कार्तिक माहात्म्य कहा था। हे विप्रेन्द्रगण ! इसके अतिरिक्त देवर्षि नारद ने भी पितामह के मुख से कार्तिक मासीय माहात्म्य को सुनकर पृथु को उपदेश प्रदान किया था। एक बार देवर्षि नारद सत्यलोक आये तथा विनयपूर्वक सर्वलोकपितामह ब्रह्मा से पूछा।।५-१०।।

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