पुजाकर्म प्रवेशिका - Pujakarma Praveshika [PDF]

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p Shivakumar Bharadwaj 2071
Karmakand, puja, पुजाविधि, गुरुपरम्परा Hindu
5th Edition 182 Hindi/ Sanskrita Indian

भारतीय सनातन वाङ्मय के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं ऋक्, यजुः, साम और अथर्व वेद। इन वैदिक संहिताओं के साथ ब्राह्मण ग्रन्थ भी हैं। इनमें यज्ञों का सविस्तार वर्णन है। ब्राह्मणों के अन्तिम भाग आरण्यकों में स्वतन्त्र रूप से दार्शनिक प्रश्नों पर विचार किया गया है। उपनिषदों में ज्ञानकाण्ड का निरूपण है। वेदांगों के रूप में में सूत्र- साहित्य का विस्तार हुआ, जिसके चार विभाग हैं- (1) श्रौतसूत्र में यज्ञों का विधान तथा वर्गीकरण किया गया है। (2) गृह्यसूत्र में गृहस्थ से सम्बन्ध रखने वाले सोलह संस्कारों तथा कर्मकाण्ड का वर्णन है। (3) धर्मसूत्र में सामाजिक, राजनैतिक एवं वैधानिक व्यवस्था दी गयी है। भारतीय इतिहास में कानूनी साहित्य का श्रीगणेश यहीं से होता है। धर्मसूत्र का विस्तार स्मृतियों के रूप में हुआ है/ 4 शुल्बसूत्र में रेखिकीय गणित वर्णित व यज्ञवेदी के निर्माण और नाप आदि का वर्णन है। है। वेदांग छः हैं- शिक्षा, कल्प (कर्मकाण्ड), निरुक्त, व्याकरण, छन्द और ज्योतिष। ज्योतिष को वेदपुरुष का नेत्र माना है। इसके ज्ञान के बिना वैदिक कार्य अन्धकारमय हैं।

 

वेदा हि यज्ञार्थमभिप्रवृत्ताः कालानुपूर्वा विहिताश्च यज्ञाः।

तस्मादिदं कालविधानशास्त्रं यो ज्योतिषं वेद स वेद सर्वम् ।।

 

छन्दः पादौ तु वेदस्य हस्तौ कल्पोऽथ पठ्यते ।

ज्योतिषामयनं चक्षुर्निरुक्तं श्रोत्रमुच्यते ।।

 

शिक्षा घ्राणं तु वेदस्य मुखं व्याकरणं स्मृतम्।

तस्मात सांगमधीत्यैव ब्रह्मलोके महीयते ।।

 

भारतीय संस्कृति अति विलक्षण है। इसके सभी कर्मविधान पूर्णतः वैज्ञानिक हैं और इनका एक ही संकल्प मानव का उपकार करना है। मनुष्य का सरलता से व शीघ्रता से कल्याण कैसे हो इसका जितना सुन्दर विचार भारतीय संस्कृति में किया गया है, उतना अन्यत्र नहीं मिलता। जन्म के पूर्व से लेकर मृत्यु के बाद तक ज्योतिष एवं कर्मकाण्ड मानव के जीवन पर गहरा प्रभाव डालता है। मनुष्य जो जो क्रियाएँ करता है. उन सबको हमारे दूरदर्शी ऋषि-मुनियों ने प्रमाणिक ढंग से सुनियोजित एवं सुसंस्कृत किया है और उन सवका उद्देश्य परम श्रेय की प्राप्ति हैं।

 

मैं ग्रामीण परिवेश से शहर की ओर नवीन संस्कृति को तलाशने के लिए अग्रसर  हुआ। मेरे माता-पिता की हार्दिक इच्छा थी, मैं संस्कृत के क्षेत्र में नवीन मापदण्ड स्थापित करूँ, और इसी आशा से उन्होंने मुझे वेद वेदांग अनुरूप गुरुकुल श्री ओंकारद्विज संस्कृत पाठशाला इन्दौर में प्रवेश दिलाया। मन की जिज्ञासा वृद्धजनों का आशीर्वाद तथा गुरुजनों की कृपा से मैनें संस्कृत महाविद्यालय से स्नातकोत्तर की यात्रा पूर्ण करके इस दुर्लभ ज्ञानकर्म को सुलभ बनाने का प्रयत्न किया है।

 

मैं ग्रामीण परिवेश से शहर की ओर नवीन संस्कृति को तलाशने के लिए अग्रसर हुआ। मेरे माता-पिता की हार्दिक इच्छा थी, मैं संस्कृत के क्षेत्र में नवीन मापदण्ड स्थापित करूँ, और इसी आशा से उन्होंने मुझे वेद वेदांग अनुरूप गुरुकुल श्री ओंकारद्विज संस्कृत पाठशाला इन्दौर में प्रवेश दिलाया। मन की जिज्ञासा वृद्धजनों का आशीर्वाद तथा गुरुजनों की कृपा से मैनें संस्कृत महाविद्यालय से स्नातकोत्तर की यात्रा पूर्ण करके इस दुर्लभ ज्ञानकर्म श्री सुलभ बनाने का प्रयत्न किया है।

 

मेरे जीवन के पूज्य गुरुजन आचार्य श्री राजारामजी पाठक, डॉ. विनायकजी पाण्डेय एवं श्रद्धेय कुलपति डॉ. मिथिला प्रसादजी त्रिपाठी, पं. श्री उमाशंकर जी जोशी एवं पं.श्री कल्याणदत्त जी शास्त्री के द्वारा समय-समय पर मुझे अपेक्षित मार्गदर्शन देकर कार्य की निर्विघ्न समाप्ति में पूर्ण सहयोग किया हैं। इनके प्रति मैं कृतज्ञ हूँ।

 

इस संग्रह के प्रेरणा स्त्रोत मेरे वरिष्ठ पं. श्री ब्रह्मानन्दजी शर्मा (करेली), पं.श्री राकेशजी भटेले एवं मित्र रहे हैं। इस अवसर पर मैं अपने मित्रों तथा पंडित महासभा, इन्दौर को भी साधुवाद देना चाहूँगा, क्योंकि उन्होंने भी अनेक प्रकार से इस महान कार्य में पूर्ण सहयोग प्रदान किया हैं। UP

 

जिनके आशीर्वाद से यह स्वप्न साकार हो सका, ऐसे मेरे प्रातः स्मरणीय पूज्य पिताजी स्व. श्री शीतलप्रसादजी भारद्वाज, पूज्यनीया माताजी श्रीमती ज्ञानवती भारद्वाज के श्रीचरणों में नतमस्तक रहते हुए आभार ज्ञापन की धृष्टता नहीं कर सकता, क्योंकि प्रस्तुत ग्रन्थ कृति उनके ही आशीषों का फल है। 

 

पूजाकर्मप्रवेशिका के संग्रह में मैंने जिन ग्रन्थों का सहयोग लिया है। मैं उन ग्रन्थों एवं विद्वानों का सदैव ऋणी रहूंगा और साथ ही इस ग्रन्थ में कोई त्रुटि हुई हो तो मुझे क्षमा करते हुए सूचित करने की कृपा करें, जिससे कि मैं आगामी संस्करण में उन त्रुटियों को नष्ट करने की चेष्टा कर सकूँ।

 

अन्त में इस ग्रन्थ के समस्त प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहयोगियों का आभार व्यक्त करते हुए, प्रस्तुत कृति "पगा कर्म प्रवेशिका" मेरे गुरुजनों एवं भूदेवों के करकमलों में सादर समर्पित करता हूँ।

 

आपरितोषाद्विदुषां न साधु मन्ये प्रयोग विज्ञानम्।

बलवदपि शिक्षितानामात्मन्य प्रत्ययं चेत

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