वेदः शिवः शिवो वेदः' वेद शिव हैं और शिव वेद हैं अर्थात् शिव वेदस्वरूप हैं। यह भी कहा है कि वेद नारायणका साक्षात् स्वरूप है- 'वेदो नारायणः साक्षात् स्वयम्भूरिति शुश्रुम'। इसके साथ ही वेदको परमात्मप्रभुका निःश्वास कहा गया है। इसीलिये भारतीय संस्कृतिमें वेदकी अनुपम महिमा है। जैसे ईश्वर अनादि अपौरुषेय हैं, उसी प्रकार वेद भी सनातन जगत्में अनादि अपौरुषेय माने जाते हैं। इसीलिये वेद-मन्त्रोंके द्वारा शिवजीका पूजन, अभिषेक, यज्ञ और जप आदि किया जाता है। 'शिव' और 'रुद्र' बहाके ही पर्यायवाची शब्द हैं। शिवको रुद्र इसलिये कहा जाता है- ये 'रुत्' अर्थात् दुःखको विनष्ट कर देते हैं- 'रुतम् दुःखम्, द्रावयति नाशयतीति रुद्रः।' रुद्रभगवान्की श्रेष्ठताके विषयमें रुद्रहृदयोपनिषद्में इस प्रकार लिखा है- सर्वदेवात्मको रुद्रः सर्वे देवाः शिवात्मकाः । रुद्रात्प्रवर्तते बीजं बीजयोनिर्जनार्दनः। यो रुद्रः स स्वयं ब्रह्मा यो ब्रह्मा स हुताशनः ॥ ब्रह्मविष्णुमयो रुद्र अग्नीषोमात्मकं जगत् ॥ - इस प्रमाणके अनुसार यह सिद्ध होता है कि रुद्र ही मूलप्रकृति-पुरुषमय आदिदेव साकार ब्रह्म हैं। वेदविहित यज्ञपुरुष स्वयम्भू रुद्र हैं। इसीसे भगवान् रुद्र (साम्ब सदाशिव) की उपासनाके निमित्त 'रुद्राष्टाध्यायी' ग्रन्थ वेदका ही सारभूत संग्रह है। जिस प्रकार दूधसे मक्खन निकाल लिया जाता है, उसी प्रकार जनकल्याणार्थ शुक्लयजुर्वेदसे रुद्राष्टाध्यायीका भी संग्रह हुआ है। इस ग्रन्थमें गृहस्थधर्म, राजधर्म, ज्ञान-वैराग्य, शान्ति, ईश्वरस्तुति आदि अनेक सर्वोत्तम विषयोंका वर्णन है। मनुष्यका मन विषयलोलुप होकर अधोगतिको प्राप्त न हो और व्यक्ति अपनी चित्तवृत्तियोंको स्वच्छ रख सके-इसके निमित्त रुद्रका अनुष्ठान करना मुख्य और उत्कृष्ट साधन है। यह रुद्रानुष्ठान प्रवृत्ति-मार्गसे निवृत्ति-मार्गको प्राप्त करानेमें समर्थ है। इस ग्रन्थमें ब्रह्मके निर्गुण एवं सगुण-दोनों रूपोंका वर्णन हुआ है। जहाँ लोकमें इसके जप, पाठ तथा अभिषेक आदि साधनोंसे भगवद्भक्ति, शान्ति, पुत्र-पौत्रादिकी वृद्धि, धन-धान्यकी सम्पन्नता तथा सुन्दर स्वास्थ्यकी प्राप्ति होती है; वहीं परलोकमें सष्ट्रति एवं परमपद (मोक्ष) भी प्राप्त होता है। वेदके ब्राह्मण-ग्रन्थोंमें, उपनिषदोंमें, स्मृतियों और पुराणोंमें शिवार्चनके साथ 'रुद्राष्टाध्यायी' के पाठ, जप, रुद्राभिषेक आदिकी विशेष महिमाका वर्णन प्राप्त होता है। वायुपुराणमें लिखा है- सागरपर्यन्तां सशैलवनकाननाम् । सर्वान्नात्मगुणोपेतां सुवृक्षजलशोभिताम् ॥ यश्च दद्यात् काञ्चनसंयुक्तां भूमिं चौषधिसंयुताम् । तस्मादप्यधिकं तस्य सक्हुद्रजपाद्भवेत् ॥ यश्व रुद्राञ्जपेन्नित्यं ध्यायमानो महेश्वरम् । स तेनैव च देहेन रुद्रः सञ्जायते ध्रुवम् ॥ अर्थात् जो व्यक्ति समुद्रपर्यन्त वन, पर्वत, जल एवं वृक्षोंसे युक्त तथा श्रेष्ठ गुणोंसे युक्त ऐसी पृथ्वीका दान करता है, जो धन-धान्य, सुवर्ण और औषधियोंसे युक्त है, उससे भी अधिक पुण्य एक बारके 'रुद्रीजप' एवं 'रुद्राभिषेक'-का है। इसलिये जो भगवान् रुद्रका ध्यान करके रुद्रीका पाठ करता है अथवा रुद्राभिषेक यज्ञ करता है, वह उसी देहसे निश्चित ही रुद्ररूप हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है। इस प्रकार साधन-पूजनकी दृष्टिसे 'रुद्राष्टाध्यायी' का विशेष महत्त्व है। बहुत दिनोंसे यह चर्चा चल रही थी कि गीताप्रेसद्वारा किसी वेदके ग्रन्थका समुचित प्रकाशन अभीतक नहीं हो सका है। इस बार निर्णय लिया गया कि वेदका सारभूत ग्रन्थ 'रुद्राष्टाध्यायी' जो शिवपूजकों एवं द्विजमात्रके लिये अत्यन्त कल्याणकारी है, उसका सर्वप्रथम प्रकाशन किया जाय। अतः गीताप्रेसके द्वारा वेदके प्रकाशनका यह प्रथम प्रयास है। प्रायः कुछ लोगोंमें यह धारणा है कि मूलरूपसे वेदमन्त्र पुण्यप्रदायक हैं, अतः इन मन्त्रोंका केवल पाठ और श्रवणमात्र ही आवश्यक है। वेदार्थ एवं वेदके गम्भीर तत्त्वोंसे वे विद्वान् प्रायः अनभिज्ञ रहते हैं। वास्तवमें उनकी यह धारणा उचित नहीं है। वैदिक विद्वानोंको वेदके अर्थ एवं उनके तत्त्वोंसे पूर्णतः परिचित होना चाहिये। प्राचीन ग्रन्थोंमें भी वेदार्थ एवं वेद-तत्त्वार्थकी बड़ी महिमा गायी गयी है। निरुक्तकार कहते हैं कि जो वेद पढ़कर उसका अर्थ नहीं जानता, वह भारवाही पशुके समान है अथवा निर्जन वनके सुमधुर उस रसाल वृक्षके समान है, जो न स्वयं उस अमृतरसका आस्वादन करता है और न किसी अन्यको ही देता है। अतः वेदमन्त्रोंके अर्थका ज्ञाता पूर्णरूपसे कल्याणका भागी होता है- स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योऽर्थम् । योऽर्थज्ञ इत् सकलं भव्रमश्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा । (निस्क) इन सब दृष्टियोंसे 'रुद्राष्टाध्यायी' का अर्थसहित प्रकाशन किया गया है। सर्वसाधारणके समझनेको दृष्टिसे मन्त्रोंका सरल भावार्थ देनेका प्रयास किया गया है। सविधि पाठ एवं अनुष्ठान करनेकी दृष्टिसे प्रारम्भमें मन्त्रोंके विनियोग तथा अङ्गन्यास भी दिये गये हैं तथा अभिषेक और पाठके पूर्व शिवार्चनकी विधि और उसके प्रकारका भी यथासाध्य निरूपण करनेका प्रयास किया गया है। आशा है, सुधीगण इससे लाभान्वित होंगे।